लॉरेंस कोहलबर्ग की थ्योरी – नैतिक विकास के 6 चरण CDP



एक छोटा बच्चा मिठाई इसलिए नहीं खाता क्योंकि मम्मी डांटेगी – और एक परिपक्व इंसान इसलिए नहीं खाता क्योंकि वो किसी और के लिए रखी गई थी। दोनों का काम एक जैसा दिखता है, लेकिन दोनों के पीछे की सोच बिल्कुल अलग है। यही फर्क समझाना था लॉरेंस कोहलबर्ग को।

लॉरेंस कोहलबर्ग की थ्योरी नैतिक विकास (Moral Development) की वो framework है जो बताती है कि इंसान का नैतिक तर्क बचपन से बड़े होने तक किन-किन चरणों से गुजरता है। कोहलबर्ग ने पियाजे के काम को आगे बढ़ाया और नैतिक विकास के 3 स्तरों में 6 चरण दिए जो CDP के सबसे ज्यादा परीक्षित टॉपिक्स में से एक हैं।

अगर आप CTET, UPTET या किसी भी TET परीक्षा की तैयारी कर रहे हो तो यह थ्योरी तुम्हें सिर्फ रटनी नहीं है – समझनी है। क्योंकि परीक्षा में इस थ्योरी से ऐसे सवाल आते हैं जो concept पर आधारित होते हैं, सीधे definition पर नहीं।


लॉरेंस कोहलबर्ग की थ्योरी से परीक्षाओं में पूछे गये प्रश्न:


CTET, UPTET, REET, MPTET, HTET, BTET, CGTET, UTET, ASSAM TET और JTET जैसी परीक्षाओं में कोहलबर्ग की थ्योरी से प्रश्न लगातार आते हैं। यहाँ उन patterns की बात करते हैं जो बार-बार देखे गये हैं –

CTET – इस परीक्षा में कोहलबर्ग के चरणों से Conceptual प्रश्न आते हैं। जैसे कि किसी बच्चे की सोच या व्यवहार का उदाहरण देकर पूछा जाता है कि वो किस चरण पर है। Difficulty – Tricky।

UPTET – यहाँ पर कोहलबर्ग और पियाजे की तुलना पर आधारित प्रश्न आते हैं। दोनों के बीच अंतर क्या है – यह pattern देखा गया है। Difficulty – Conceptual।

REET – राजस्थान में हेंज दुविधा (Heinz Dilemma) और उससे जुड़े नैतिक तर्क पर सीधे प्रश्न आते हैं। Difficulty – Direct।

MPTET और HTET – इन परीक्षाओं में Post-conventional level से जुड़े प्रश्न और नैतिकता की परिभाषा वाले प्रश्न देखे गये हैं। Difficulty – Conceptual।

BTET और CGTET – कोहलबर्ग के किस चरण में बच्चा नियमों को सामाजिक व्यवस्था मानता है, यह पूछा जाता है। Difficulty – Direct।

एक बात याद रखो – इन परीक्षाओं में अक्सर गलत options इतनी चालाकी से बनाए जाते हैं कि अगर तुमने सिर्फ नाम रट लिए हैं तो confuse हो जाओगे। इसीलिए आगे हर चरण को उदाहरण के साथ समझते हैं।

लॉरेंस कोहलबर्ग कौन थे और थ्योरी की शुरुआत कहाँ से हुई


लॉरेंस कोहलबर्ग (1927-1987) एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने जीन पियाजे की नैतिक विकास की अवधारणा को और गहराई से explore किया। पियाजे ने बच्चों में दो चरण की नैतिकता बताई थी – heteronomous और autonomous। कोहलबर्ग ने इसे आगे बढ़ाकर 3 स्तर और 6 चरणों की एक पूरी संरचना दी।

कोहलबर्ग ने अपनी थ्योरी बनाने के लिए एक खास तरीका अपनाया। उन्होंने 10 से 16 साल के बच्चों को नैतिक दुविधाएं (Moral Dilemmas) सुनाईं और पूछा कि इस situation में क्या करना चाहिए और क्यों। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि कोहलबर्ग के लिए जवाब से ज्यादा जरूरी था कारण – क्योंकि कारण ही बताता है कि इंसान किस नैतिक स्तर पर सोच रहा है।

इनमें सबसे मशहूर थी हेंज दुविधा (Heinz Dilemma)। इस कहानी में हेंज नाम का एक आदमी अपनी बीमार पत्नी को बचाने के लिए एक दवाई की दुकान से दवा चुरा लेता है क्योंकि वो उसे खरीद नहीं सकता था। अब सवाल था – क्या हेंज ने सही किया? और सबसे जरूरी – क्यों?

अलग-अलग उम्र के बच्चों और बड़ों ने इस सवाल का जवाब अलग-अलग कारणों से दिया। इन्हीं कारणों को analyze करके कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के तीन स्तर तय किए।

परीक्षा में यह point ऐसे आता है – हेंज दुविधा किससे सम्बंधित है, और यह किस थ्योरी का हिस्सा है। Direct question।

कोहलबर्ग के नैतिक विकास के तीन स्तर क्या हैं.


कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन स्तरों में बांटा है – Pre-conventional, Conventional और Post-conventional। हर स्तर में दो-दो चरण हैं, यानी कुल 6 चरण। यह तीनों स्तर उम्र के साथ बढ़ते हैं, लेकिन कोहलबर्ग का मानना था कि हर इंसान तीसरे स्तर तक नहीं पहुँचता।


पहला स्तर – Pre-conventional नैतिकता


यह स्तर मुख्यतः छोटे बच्चों में देखा जाता है, लगभग 4 से 10 साल की उम्र में। इस स्तर पर बच्चा नैतिकता को बाहरी नजरिए से देखता है। यानी, उसके लिए सही या गलत का फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कोई सजा मिलेगी या कोई इनाम।

CDP Special Term – यहाँ समझो External Motivation क्या होता है। जब बच्चा इसलिए अच्छा काम करता है क्योंकि उसे reward मिलेगा, और इसलिए गलत काम नहीं करता क्योंकि punishment का डर है – तो यह External Motivation है। उदाहरण – रमेश होमवर्क इसलिए करता है क्योंकि अगर नहीं किया तो टीचर मारेगी।
H4 चरण 1 -Obedience and Punishment Orientation
इस चरण में बच्चा सोचता है कि जो काम सजा दिलाए, वो गलत है और जो सजा न दिलाए, वो सही है। नैतिकता का कोई आंतरिक एहसास नहीं होता। बच्चा सिर्फ शक्तिशाली लोगों की बात मानता है ताकि दंड से बचे।

उदाहरण के तौर पर – हेंज दुविधा में इस चरण का बच्चा कहेगा: हेंज को दवा नहीं चुरानी चाहिए थी क्योंकि उसे जेल जाएगा। वजह यह नहीं कि चोरी गलत है, बल्कि वजह यह है कि सजा मिलेगी।
H4 चरण 2 – Individualism and Exchange
इस चरण में बच्चा थोड़ा और समझदार हो जाता है। वो सोचता है कि अगर मेरा काम हो जाए तो सही है। यहाँ एक तरह की लेन-देन वाली नैतिकता होती है – मैं तुम्हारे लिए करूँगा तो तुम मेरे लिए करो।

उदाहरण – हेंज दुविधा में यह बच्चा कहेगा: हेंज को दवा चुरानी चाहिए थी क्योंकि उसकी पत्नी उसके काम आती है। यानी नैतिकता अभी भी self-interest पर टिकी है।

परीक्षा Tip – Pre-conventional stage में दोनों चरणों में फर्क याद करने का तरीका – चरण 1 में डर है, चरण 2 में सौदा है। Exam में इनको swap करके गलत option बनाया जाता है।

दूसरा स्तर – Conventional नैतिकता


यह स्तर किशोरावस्था (adolescence) और अधिकांश वयस्कों में देखा जाता है। इस स्तर पर व्यक्ति समाज के नियमों, परिवार की अपेक्षाओं और कानून को नैतिकता का आधार मानता है। यहाँ सवाल यह नहीं रहता कि मुझे क्या फायदा होगा – बल्कि सवाल यह होता है कि समाज क्या सोचेगा।

CDP Special Term – Social Conformity क्या है। जब व्यक्ति इसलिए सही काम करता है क्योंकि समाज यही उम्मीद करता है, इसी को Social Conformity कहते हैं। उदाहरण – सुनीता बड़ों को प्रणाम इसलिए करती है क्योंकि उसके परिवार में यही परंपरा है और सब ऐसा ही करते हैं।
H4 चरण 3 – अच्छे लड़के या अच्छी लड़की बनने का कोशिस करना
इस चरण में व्यक्ति दूसरों को खुश करने के लिए अच्छा व्यवहार करता है। दूसरों की नजर में अच्छा दिखना, दूसरों की प्रशंसा पाना – यही नैतिकता का पैमाना बन जाता है।

हेंज दुविधा में इस चरण का व्यक्ति कहेगा: हेंज को दवा चुरानी चाहिए थी क्योंकि एक अच्छा पति यही करता है। यहाँ पत्नी के प्रति प्रेम और लोगों की नजर में अच्छा बनना – दोनों काम कर रहे हैं।

चरण 4 – Law and Order ओरिएण्टशन

इस चरण में व्यक्ति यह मानने लगता है कि नियम और कानून का पालन करना सबसे बड़ी नैतिकता है। समाज की व्यवस्था बनाए रखना ही सबसे जरूरी है। चाहे कुछ भी हो, कानून तोड़ना गलत है।

हेंज दुविधा में यह व्यक्ति कहेगा: हेंज को दवा नहीं चुरानी चाहिए थी क्योंकि चोरी कानून के खिलाफ है। अगर सब कानून तोड़ने लगें तो समाज कैसे चलेगा। यहाँ ध्यान दो – यह व्यक्ति कानून को ऊपर रखता है, इंसानी जान को नहीं।

Exam Tip – Conventional level में चरण 3 का keyword है approval (स्वीकृति), चरण 4 का keyword है law (कानून)। Exam में इन दोनों को आपस में confuse करवाने वाले options आते हैं। Tricky question pattern।

Did You Know – कोहलबर्ग का मानना था कि ज्यादातर वयस्क जीवनभर Conventional level यानी चरण 3 और 4 में ही रहते हैं। Post-conventional level तक पहुँचना सबके लिए संभव नहीं होता।


तीसरा स्तर – Post-conventional नैतिकता

यह सबसे उच्च और सबसे कम देखा जाने वाला स्तर है। यहाँ व्यक्ति नैतिकता को कानून या समाज की राय से ऊपर मानता है। वो खुद के नैतिक सिद्धांत बनाता है जो universal होते हैं। यह स्तर सभी वयस्कों में नहीं होता – यह एक दुर्लभ नैतिक परिपक्वता है।

CDP Special Term – Universal Principles क्या होते हैं। जब कोई व्यक्ति ऐसे नैतिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेता है जो सभी इंसानों के लिए समान रूप से लागू हों, जैसे न्याय, समानता, मानवता – तो यह Universal Principles हैं। उदाहरण – महात्मा गांधी ने अंग्रेजी कानून तोड़ा लेकिन उनके पीछे न्याय और मानवता का बड़ा सिद्धांत था।


यह सबसे उच्च और सबसे कम देखा जाने वाला स्तर है। यहाँ व्यक्ति नैतिकता को कानून या समाज की राय से ऊपर मानता है। वो खुद के नैतिक सिद्धांत बनाता है जो universal होते हैं। यह स्तर सभी वयस्कों में नहीं होता – यह एक दुर्लभ नैतिक परिपक्वता है।

CDP Special Term – Universal Principles क्या होते हैं। जब कोई व्यक्ति ऐसे नैतिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेता है जो सभी इंसानों के लिए समान रूप से लागू हों, जैसे न्याय, समानता, मानवता – तो यह Universal Principles हैं। उदाहरण – महात्मा गांधी ने अंग्रेजी कानून तोड़ा लेकिन उनके पीछे न्याय और मानवता का बड़ा सिद्धांत था।

चरण 5 – सामाजिक अनुबंध अभिमुखीकरण


इस चरण में व्यक्ति यह मानता है कि कानून समाज की भलाई के लिए बनाए जाते हैं। अगर कोई कानून सही नहीं है तो उसे बदला जाना चाहिए। कानून पत्थर में नहीं लिखे हैं – ये लोगों की सहमति से बनते हैं और बदल भी सकते हैं।

हेंज दुविधा में यह व्यक्ति कहेगा: हेंज ने जो किया वो कानूनी रूप से गलत था, लेकिन नैतिक रूप से समझा जा सकता है। कानून हर situation में सही नहीं हो सकता। दवाई के कानून में सुधार होना चाहिए।
H4 चरण 6 – सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिमुखीकरण (Universal Ethical Principle Orientation)
यह कोहलबर्ग का सबसे उच्चतम चरण है। यहाँ व्यक्ति खुद के अंदर से आने वाले नैतिक सिद्धांतों के आधार पर काम करता है। न्याय, मानव की गरिमा, सम्मान – ये universal values हैं जो किसी भी कानून से ऊपर हैं।

हेंज दुविधा में यह व्यक्ति कहेगा: एक इंसान की जान किसी भी संपत्ति से ज्यादा कीमती है। हेंज ने सही किया क्योंकि मानव जीवन का सम्मान सबसे बड़ा नैतिक सिद्धांत है।

कोहलबर्ग खुद मानते थे कि इस चरण तक बहुत कम लोग पहुँचते हैं और बाद में उन्होंने एक चरण 7 का भी जिक्र किया जो cosmic या spiritual perspective से जुड़ा था, लेकिन यह उनकी main theory में शामिल नहीं है।

Exam Tip – Post-conventional level में चरण 5 में कानून बदलने की सोच है, चरण 6 में कानून से ऊपर सिद्धांत हैं। Exam में इनके बीच का फर्क पूछा जाता है। Conceptual question।

कोहलबर्ग और पियाजे की थ्योरी में अंतर


कोहलबर्ग और पियाजे दोनों ने बच्चों के नैतिक विकास पर काम किया, लेकिन दोनों के नजरिए में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।

पियाजे ने नैतिकता के दो चरण दिए – Heteronomous Morality (नियम बाहर से थोपे जाते हैं) और Autonomous Morality (नियम अपने अंदर से आते हैं)। पियाजे का ज्यादा ध्यान उम्र पर था और उनका मानना था कि 10-11 साल के बाद बच्चा Autonomous Morality की तरफ बढ़ता है।

कोहलबर्ग ने पियाजे को आगे बढ़ाया। उन्होंने सिर्फ उम्र को नहीं, तर्क की गुणवत्ता को देखा। उनके लिए जवाब से ज्यादा जरूरी था कि व्यक्ति क्यों ऐसा सोचता है। कोहलबर्ग ने 6 चरण दिए और यह माना कि यह चरण हर उम्र में अलग हो सकते हैं, जरूरी नहीं कि उम्र के साथ ही बदलें।

दोनों में एक बड़ा common point यह है कि दोनों cognitive development को moral development से जोड़ते हैं। यानी बच्चे की सोचने की क्षमता जैसे-जैसे विकसित होती है, उसकी नैतिकता भी बदलती है।

[Internal Link: पियाजे की संज्ञानात्मक विकास थ्योरी]

कोहलबर्ग की थ्योरी की आलोचना क्यों होता है


कोहलबर्ग की थ्योरी को CDP में पढ़ते समय सिर्फ उनके stages नहीं, बल्कि उनकी limitations भी जाननी जरूरी हैं क्योंकि परीक्षा में यह भी पूछा जाता है।

Carol Gilligan ने कोहलबर्ग पर सबसे बड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि कोहलबर्ग ने अपना research मुख्यतः लड़कों पर किया और उनकी theory male-biased है। Gilligan ने कहा कि लड़कियाँ न्याय (justice) की बजाय care और relationship की भाषा में सोचती हैं – और यह भी एक उच्च नैतिकता है, कमतर नहीं।

दूसरी बड़ी आलोचना यह है कि कोहलबर्ग की थ्योरी Western और individualistic culture को ज्यादा importance देती है। भारत जैसे collectivist समाज में नैतिकता का मतलब परिवार और समुदाय की भलाई होता है, न कि individual principles।

तीसरी आलोचना यह है कि थ्योरी केवल नैतिक सोच (moral reasoning) को measure करती है, नैतिक व्यवहार (moral behavior) को नहीं। एक व्यक्ति चरण 6 जैसा सोच सकता है लेकिन चरण 1 जैसा काम कर सकता है।

Exam में Gilligan की आलोचना वाला point Tricky options में आता है। याद रखो – Gilligan ने Gender Bias की आलोचना की थी।

Did You Know – Carol Gilligan ने बाद में अपनी खुद की थ्योरी दी जिसे Theory of Care Ethics कहते हैं। यह CTET और UPTET में increasingly पूछी जा रही है। [Internal Link: कैरल गिलिगन की केयर एथिक्स थ्योरी]
H2 कोहलबर्ग की थ्योरी का कक्षा में व्यावहारिक उपयोग
एक शिक्षक के रूप में कोहलबर्ग की थ्योरी को सिर्फ जानना नहीं, बल्कि classroom में apply करना भी परीक्षा में पूछा जाता है। यह pedagogy का हिस्सा है।

अगर बच्चा Pre-conventional stage में है – यानी 4-8 साल का – तो उसे rules की clear explanation देनी होगी। उसे बताना होगा कि अगर यह करोगे तो क्या होगा। सीधा consequence-based communication काम करता है। इस उम्र में abstract moral reasoning से कोई फर्क नहीं पड़ता।

अगर बच्चा Conventional stage में है – यानी 9-15 साल का – तो group activities और peer learning काम आती हैं। इस उम्र में दूसरों की राय मायने रखती है। Class discussion, role play और social responsibility वाले projects इस stage पर बेहतरीन काम करते हैं।

Post-conventional stage के लिए – जो बड़े students होते हैं – उनके साथ open-ended moral dilemmas discuss करो। उन्हें खुद तर्क बनाने दो। Debate और case-study based learning यहाँ सबसे उपयुक्त है।

Exam Tip – Pedagogy में application-based question में यह पूछा जाता है कि किस stage के बच्चे के लिए कौन सी teaching strategy उपयुक्त है। यह Conceptual question है और इसमें stage की सही पहचान जरूरी है।


एग्जाम के लिए महत्वपूर्ण तथ्य:

• कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के 3 स्तर और 6 चरण दिए – यह सबसे basic और सबसे पूछा जाने वाला fact है।

• हेंज दुविधा (Heinz Dilemma) कोहलबर्ग की research का मुख्य instrument था – यह Direct question pattern है।

• Pre-conventional stage में डर और इनाम प्रेरक होते हैं, Conventional में समाज की स्वीकृति, Post-conventional में universal principles।

• Carol Gilligan ने कोहलबर्ग की थ्योरी को Gender Biased बताया – यह अक्सर Tricky option में आता है।

• कोहलबर्ग ने पियाजे की थ्योरी को आगे बढ़ाया – दोनों cognitive development को moral development से जोड़ते हैं।

• Post-conventional level तक सभी लोग नहीं पहुँचते – यह कोहलबर्ग का स्पष्ट मत था।

• चरण 6 में Universal Ethical Principles होते हैं जो law से भी ऊपर होते हैं – जैसे न्याय और मानव की गरिमा।

• कोहलबर्ग ने अपनी research 10-16 साल के लड़कों पर की थी – यह Gilligan की आलोचना का आधार भी है।



लॉरेंस कोहलबर्ग की थ्योरी लेख का निष्कर्ष

लॉरेंस कोहलबर्ग की थ्योरी सिर्फ एक theory नहीं है – यह एक आईना है जो हमें दिखाता है कि हम खुद नैतिक रूप से कहाँ खड़े हैं। CDP के किसी भी paper में इस topic को skip करने की गलती मत करना क्योंकि यह topic अकेले 2 से 4 questions generate कर सकता है – और यह सब Conceptual level पर।

पूरे topic को एक line में कहना हो तो – कोहलबर्ग ने बताया कि नैतिकता कोई fixed चीज नहीं है, यह सोच के साथ विकसित होती है, और हर इंसान अलग-अलग नैतिक चरण पर हो सकता है।

अब exam की तैयारी के लिए एक practical tip – सिर्फ तीनों levels और छह stages के नाम मत याद करो। हर stage के लिए एक real-life उदाहरण खुद बनाओ जो तुम्हें personally relatable लगे। जैसे – अपने बचपन की कोई घटना याद करो जब तुमने कुछ इसलिए नहीं किया क्योंकि डर था। वो Pre-conventional था। और अब जब तुम कुछ गलत इसलिए नहीं करते क्योंकि तुम्हें खुद पता है कि यह गलत है – वो Post-conventional की तरफ बढ़ना है। जब theory खुद से जुड़ जाती है, तो वो कभी भूलती नहीं।

साथ ही हेंज दुविधा को हमेशा अपने पास रखो। किसी भी stage का example इसी से दे सकते हो। परीक्षा में यह एक जादुई tool है।

Carol Gilligan की आलोचना को एक अलग section की तरह याद रखो – Gender Bias और Care Ethics – यह trap option बनाने के लिए examiners का पसंदीदा हथियार है।

Pedagogy का हिस्सा जो है – कि कौन सी stage पर कौन सी teaching strategy – उसे भी link करके याद करो। Pre-conventional पर consequence, Conventional पर group discussion, Post-conventional पर open dilemmas।

अंत में एक बात – CDP का यह topic इसलिए important है क्योंकि यह तुम्हें एक बेहतर teacher बनने में भी help करता है। जब तुम किसी बच्चे का व्यवहार देखोगे, तो तुम समझ पाओगे कि वो कहाँ है और उसे कैसे guide करना है। यह knowledge सिर्फ exam तक सीमित नहीं है।



टॉपिक सम्बंधित पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ):

प्रश्न 1 : लॉरेंस कोहलबर्ग की थ्योरी क्या है?
उत्तर – यह नैतिक विकास की theory है जिसमें 3 स्तर और 6 चरण हैं।

प्रश्न 2 : हेंज दुविधा क्या है और यह किस थ्योरी से जुड़ी है?
उत्तर – यह एक नैतिक दुविधा की कहानी है जो कोहलबर्ग ने research के लिए उपयोग की।

प्रश्न 3 : कोहलबर्ग के Pre-conventional stage में कौन से चरण हैं?
उत्तर – चरण 1 – दंड और आज्ञाकारिता, चरण 2 – व्यक्तिगत उद्देश्य।

प्रश्न 4 : Carol Gilligan ने कोहलबर्ग की आलोचना क्यों की?
उत्तर – Gilligan ने कहा कि theory male-biased है और महिलाओं की care-based नैतिकता को नजरअंदाज करती है।

प्रश्न 5 : कोहलबर्ग और पियाजे की थ्योरी में क्या अंतर है?
उत्तर – पियाजे ने 2 चरण दिए, कोहलबर्ग ने 6 चरण और तर्क की गुणवत्ता पर जोर दिया।

प्रश्न 6 : Post-conventional stage की क्या विशेषता है?
उत्तर – यहाँ व्यक्ति universal ethical principles के आधार पर निर्णय लेता है, law से ऊपर।

प्रश्न 7 : CTET में कोहलबर्ग की थ्योरी कैसे पूछी जाती है?
उत्तर – बच्चे के व्यवहार का उदाहरण देकर stage identify करने वाले conceptual questions आते हैं।

प्रश्न 8 : क्या कोहलबर्ग की थ्योरी की कोई सीमा है?
उत्तर – हाँ, यह Western culture और male subjects पर आधारित है, सभी समाजों पर लागू नहीं होती।

प्रश्न 9 : कोहलबर्ग के अनुसार सभी लोग चरण 6 तक पहुँचते हैं क्या?
उत्तर – नहीं, कोहलबर्ग का मानना था कि Post-conventional level तक बहुत कम लोग पहुँचते हैं।

प्रश्न 10 : कोहलबर्ग की थ्योरी classroom में कैसे उपयोग होती है?
उत्तर – बच्चे की stage के अनुसार teaching strategy तय की जाती है, जैसे Pre-conventional में consequence-based approach।

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ABHISHEK SHORI

ABHISHEK SHORI

अभिषेक शोरी एक Government Higher Secondary School Teacher हैं और MSc Biology में पोस्ट ग्रेजुएट हैं। Competition Exam की तैयारी के दौरान उन्हें जीव विज्ञान से गहरा लगाव हुआ, और उसी जुनून ने peakstu.in website को बनाया ।
इस blog पर वे NEET, UPSC, SSC, PSC, RAILWAY, VYAPAM, CTET, EMRS, KVS और अन्य Government Exams के students के लिए 👉 Biology और 👉 CDP से जुड़े topics को सरल हिंदी में explain करते हैं। उनका मकसद एक ही है — शुद्ध और भरोसेमंद जानकारी, मातृभाषा में।


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